Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verses 30–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verses 30–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में निद्राविहीन आत्मा की सुषुप्ति भी है ही नहीं, इस अभिप्राय से कहते हैं।
निद्राविहीन आत्मा के वे जाग्रत्, स्वप्न आदि कोई कदापि नहीं है एवं दृश्य का आत्यन्तिक
अदर्शनरूप अथवा आत्मा का उच्छेद आदिरूप मृत्यु भी है ही नहीं, क्योंकि अविलुप्त चित्सत्ता मृत्युअ्रम
के अनन्तर तुरन्त ही दृश्य को देखती है