Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
अतएव निद्राविहीन आत्मा में जाग्रत् और स्वप्न दोनों का ही व्यभिचार होने से अभाव ही है, ऐसा
कहते हैं।
निद्राविहीन आत्मा में जाग्रत का कदापि संभव नहीं है। जो जाग्रत के नाम से प्रसिद्ध रूप है, वह
स्वप्न ही है। निद्राविहीन आत्मा में स्वप्न का भी संभव नहीं है, जो स्वप्न नाम से प्रसिद्ध है वह सुप्त और
जाग्रत् एकरूप ब्रह्म की ज्ञानरूपता ही है