Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
TODO
हिन्दी अर्थ
जाग्रत् और स्वप्न दोनों ही केवल चित्भान ही हैँ, अतएव इनमें विभिन्नता
कैसी ? जाग्रत ओर स्वप्न के नगर अनुभव से सदृशस्वरूप ही हैं अर्थात् उनका वेद्य स्वरूप अथवा
वेदन स्वरूप अनुभवतः तुल्य ही है