Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 31–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verses 31–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 31-33
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
तथा पृथिवी आदि घनपिण्डरूप सृष्टि का क्या
कारण है ? अविद्या का क्या कारण है और ब्रह्म का क्या कारण है ? सृष्टि के आदि में वायु का, जल का
क्या कारण है, तेज का क्या कारण है ? वेदन से अतिरिक्त इनका कोई दूसरा स्वरूप न होने से ये
वेदनमात्ररूप वाले हैं । कोई साधन न होने से ही ये असिद्ध है, अतएव आकाशात्मक (शून्यरूप) हैं।
और मरे हुए लोगों का पिण्डग्रहरूप देहप्राप्ति में क्या कारण है ? सब सृष्टियाँ पहले से इसी तरह
अकारण होती चली आ रही हैं