Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इससे सिद्ध हुआ कि सकल सृष्टियाँ अकारण और भ्रमरूप है, ऐसा कहते हैं।
जगत् में सकल सृष्टियाँ यों ही होती चली आ रही हैं। चिरकाल तक देखने से भ्रान्तिदृष्टि से जैसे
आकाश में केशों के गोले घूमते दिखाई देते हैं वैसे ही ये सृष्टियाँ जगत् में राशि-राशि रूपसे चक्कर
काटती हैं ॥३ ४॥ इसी तरह प्रवृत्त हुई हिरण्यगर्भरूपी सृष्टिने पीछे पृथिवी आदि रुपवाले अपने स्वरूप
की ही पृथिवी आदि संज्ञाएँ की । अतएव पहले सृष्टियाँ चिदाकाश में वायु के स्पन्द की तरह तथा
मनोराज्य की तरह अत्यन्त सूक्ष्मरूप से प्रतीत होती हें चिरकाल के अभ्यास से स्थूल बनकर देह, कर्म
आदि कारणों की कल्पना करती हैं