Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
प्रथम कल्पना में जिस पदार्थ की जैसी कल्पना की
जाती है वह वैसा शरीर धारण करता है वही नियति बनती है । चूँकि कल्पित चिति का ऐसा यह निज
स्वभाव है। अपने से कल्पित पदार्थों में यह बात अनुभवसिद्ध है, यह भाव है