Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जिस जिस भानरूप स्वरूप का सृष्टि के अनुकूल हिरण्यगर्भ की चिति ने पहले चित् में ही अपने
आप "मैं ही अमुक हूँ” ऐसा संकल्प किया वह आज भी वैसा ही स्थित हे