Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 42–57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verses 42–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
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ब्रह्मादिमानसोऽप्यस्य सोऽप्यन्यत्र चिदम्बरे ।
इत्यपर्यवसानेयं शान्तैका चिन्नभोगतिः ॥ ५६ ॥
चितिनभसि चिन्नभःश्रीः कचतीति निरामया विदुषाम् ।
मूर्खाणां तु यथैषा यादृग्वा तन्मयीह न सत् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो मैने महामुनि से यह पूछा था कि क्या ये सब लोग एकसाथ ही अशुभ कर्म करते हैं ? इसी का
उत्तर देते हुए उपसंहार करते हैं।
कोई जीव साथ मिल-जुलकर भी शुभ-अशुभ पुण्य-पाप कर्म करते हैं उसका फल भी वे
मिलजुलकर ही पाते हैं। लेकिन कोई हजारों जीवन्मुक्त पुरुष (मैं कर्ता हूँ) इस प्रकार के अभिमान से
शून्य होने के कारण अकर्ता होने पर भी जैसे पर्वतशिखर के पत्थर पाप किये बिना ही वज्रपात का
अनुभव करते हैं वैसे ही अकारण ही दुःख पाते हैं