Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
इत्यादिमध्यरहितोऽयमनन्तरूपः संविद्धनः कचति काञ्चनतापवत्खे ।
तत्फाललोलवपुरात्मनि चिन्मयात्मा सर्गात्मभिर्विकसितैरसितैः सितैश्च ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके बाद मुझे अपने पहले के मुनिभाव का स्मरण हो आया, ऐसा कहते है ।
तदनन्तर अहा यह मैं पहले मुनि था, ऐसा मेरा ख्याल हो आया फिर तो जमे हुए प्रचुर आश्चर्यवश
हृदय से स्नान किया हुआ-सा मैं आर्द्र हो गया