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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 36–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verses 36–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 36,37

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

तो उसके दर्शन का क्या उपाय है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। यदि तुम योग से एकाग्र बुद्धि से इसका स्वयं अवलोकन करते हो तो ज्ञानदृष्टि से इसे हाथ में स्थित कमल के समान सम्पूर्णतः देखते ही हो । फिर भी यदि मेरे वचन से इसे सुनने की तुम्हारी इच्छा है तो सुनो, जैसी घटना घटी है उसे आद्योपान्त सम्पूर्णतया तुमसे कहता हूँ