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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 151, Verses 53–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 151, verses 53–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 151 · श्लोक 53-55

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मुनि ने कहा : हे व्याध, जैसे संकल्प के नाश और उदय में संकल्प करनेवाले पुरुष का मनस्पन्द ही कारण है, वैसे ही त्रिजगत्‌का संकल्प करनेवाले विधाता का तुरन्त प्रवृत्त हुआ मनस्पन्द ही त्रिजगत्‌ है। उसके विनाश और उदय में भी उसका मनस्पन्द ही हेतु है। जैसे लोक में हृदय में भय आदि वश क्षोभ, अक्षोभ (शान्ति) आदि में तुरन्त प्रवृत्त हुआ मन का स्पन्द ही कारण है वैसे ही तीनों जगतां के क्षोभ ओर अक्षोभ में (शान्ति में) वही (हिरण्यगर्भ का मनस्पन्द ही) हेतु है चूकि यह जगत्‌ विधाता स्वप्ननगर ही है अतएव उनके मनका स्पन्द ही प्रजा जनों के उदय, क्षय, क्षोभ, वृष्टि, अनावृष्टि आदि का कारण हे