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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 153, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

अन्यमुनिरुवाच । आवयोश्चरतोस्तस्मिन्वने चिरतरं तपः । मृगानुसरणश्रान्तो मृगव्याध उपैष्यति ॥ १ ॥ तं त्वं स्वभावपुण्याभिः कथाभिर्बोधयिष्यसि । तपस्तत्रैव विपिने स विरक्तश्चरिष्यति ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनि ने कहा : हे व्याध, यह कहकर रात्रि के समय वह मुनिमहाराज अपने विस्तर पर चुप हो गये। तदुपरान्त मारे आश्चर्य के मैं भी आँधी के बवण्डर में पड़ा हुआ-सा हो गया | तदनन्तर बहुत देर बाद सन्नाटा भंग करते हुए मैंने कहा : हे मुनिप्रवर, हे विभो, तब तो इस प्रकार सारा स्वप्न यथार्थ है ऐसा मैं समझता हूँ। मे मतिः“ कहने से असंभावना द्वारा आश्चर्य प्रकट किया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ इक्यावन सर्ग समाप्त एक यौ बावनवाँ सर्ग अन्य मुनि द्वारा मुनिजी की स्वप्नपदार्थो की सत्यता-शंका का निवारण |