Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 152, Verses 12–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 152, verses 12–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 152 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
इहस्थं मामिमं त्वं च न त्यक्ष्यसि सपर्यया ।
अहं भवद्भिः सहितो निवत्स्यामीति निश्चयः ॥ १२ ॥
साधो यातेषु वर्षेषु ततः कतिपयेष्विह ।
सर्वबन्धुविनाशस्ते दुर्भिक्षेण भविष्यति ॥ १३ ॥
मत्तसीमान्तसामन्तविग्रहेण तदैव च ।
सर्वो गृहात्तनुप्राणिर्ग्रामकोऽयं विनङ्क्ष्यति ॥ १४ ॥
इहैवैकत्र कस्मिंश्चित्तरुखण्डकजालके ।
समाचारौ निवत्स्यावः शून्ये चन्द्ररवी यथा ॥ १६ ॥
उत्पत्स्यते त्वरण्येऽस्मिन्कालेन वनमुत्तमम् ।
शालताललताजालवलिताखिलभूतलम् ॥ १७ ॥
तालीतमालदलताण्डवमण्डिताशं व्याकोशपद्मवनवन्द्यविकासिवृक्षम् ।
कूजच्चकोरचयचारुलतानिकुञ्जमुद्भासि नन्दनमिवागतमन्तरिक्षात् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घटना घटी थी वह मैंने आद्योपान्त सम्पूर्ण आपसे कही | यदि मेरे कथन पर सन्देह हो
तो आप भी ध्यान से इस अनुभूत दृश्य को स्वयं पूर्ण रूप से देखेंगे इस तरह आदि मध्य रहित
अनन्तरूप यह संवित्-घन चिन्मयात्मा ही अपनी विकसनशक्ति के उछाल से चंचल शरीर होकर
अपने में दुष्कर्मो के फलरूप खराब, सत्कर्मो के फलभूत उत्तम और मिश्रित कर्मो के फलभूत मिश्रित
विकासरूप सृष्टियों द्वारा आकाश में सुनहले प्रकाश की भाँति विकसित होता है, अन्य नहीं