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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 153, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

कथयिष्यसि तस्मै त्वमात्मज्ञानमखण्डितम् । स्वप्नाख्येन प्रसङ्गेन सोऽतो योग्यो भविष्यति ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न का भान होता है वैसे ही आदि में इस जाग्रत्‌ दृश्य का भी भान होता हे । यह जाग्रत्‌ पृथिवी आदि से रहित होनेपर भी पृथिवी आदि से युक्त प्रतीत होता है