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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 153, Verses 8–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 153, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 153 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

अथ रात्र्यां व्यतीतायां स प्रभाते महामुनिः । तथा संपूजितो येन तत्रैव रतिमाप्तवान् ॥ ८ ॥ अनन्तरं गृहे तस्मिंस्तस्मिन्ग्रामगृहे तथा । स्थितावावां स्थिरमती कृतभावौ परस्परम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

(&) “व्याधमहागुरो” यह सम्बोधन आपकी अपेक्षा भी मन्दबुद्धि व्याध को समाने के समय आपको उपपादन श्रम ज्ञात होगा, यह सूचित करने के लिए है। (00) "पुष्करपत्राक्ष" (कमलनयन) यह सम्बोधन केवल नेत्र के सौन्दर्य से यह विषय नहीं जाना जा सकता, यह सूचित करने के लिए दिया गया हे । जगत्‌ का सत्‌ रूप से ही अनुभव कर रहे आपके जगत्‌ असत्‌ है या नहीं इस सन्देह में कोर्ड बीज भी नहीं है, ऐसा कहते है । हे मुने, जव आप इस प्रकार इस विस्तारयुक्त स्वप्न जगत्‌ का स्पष्टरूप से यह सत्‌ ही है, ऐसा अनुभव करते हैं तब उसमें “हे या नहीं है” यह सन्देह कैसे हो सकता है ? इसके वाद यह सब कह रहे उन मुनि महाराज के वचन-प्रवाह को एक दूसरा प्रश्न उपस्थित कर मैंने बीच में रोक दिया ओर उनसे पूछा : महाराज, मेरी व्याधगुरुता कैसे है, यानी मैं व्याध का गुरु कैसे हूँ कृपया मुझे बतला दीजिये