Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verses 1–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verses 1–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 1-6
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
इति निर्णीय दृश्येऽस्मिन्स्थितोऽस्मि विगतज्वरः ।
वीतरागो निराशङ्को निर्वाणो निरहंकृतिः ॥ १ ॥
निराधारो निराधेयो निर्मानो निरुपाश्रयः ।
स्वभावस्थः स्वयं शान्तः सर्गात्मा सर्वथोदितः ॥ २ ॥
यथाप्राप्तस्य कर्तास्मि न कर्तास्मि कदाचन ।
स्वयमेव हि यो व्योम कर्तृता तस्य कीदृशी ॥ ३ ॥
द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः ।
इत्येकात्म नभः सर्वं भूतजालैकचिद्वपुः ॥ ४ ॥
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ।
न विधिप्रतिषेधौ मे न मे बाह्यं न मेऽन्तरम् ॥ ५ ॥
इति मे तिष्ठत इह यथासंस्थानसंस्थितेः ।
अद्यायं त्वमनुप्राप्तः काकतालीयवत्पुरः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्म-ज्ञान का उपदेश देंगे। उसे ग्रहणकर वह योग्य हो जायेगा। इस प्रकार से आप उसके गुरु होंगे।
इस कारण हे मुनिवर, मैंने आपको “व्याधगुरो" इस सम्बोधन से पुकारा है। जिस प्रकार यह संसार भ्रम
है, जैसा मैं यहाँपर हूँ और जैसे आप यहाँपर हैं एवं जो आगे आपका होनेवाला है वह सब मैंने आपसे
कहा