Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verses 7–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verses 7–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 7-14
संस्कृत श्लोक
इति ते सर्वमाख्यातं यथा स्वप्नो यथा वयम् ।
यथा जगद्यथा च त्वं यथा दृश्यमिदं तथा ॥ ७ ॥
त्वं च यादृग्दृश्यमिदं यथा दृश्यमिदं पुरः ।
यथा भावा यथा ब्रह्म यथेमा जनताः पुरः ॥ ८ ॥
एतद्बुद्ध्वा भवाञ्छान्तो मिथ्या लुब्धक लुब्धक ।
शान्तैवैवमियं सत्ता चिन्मात्रव्योमरूपिणी ॥ ९ ॥
लुब्धक उवाच ।
स्वयमाभाति निर्वाणा नैव वाभाति किंचन ।
एवं चेत्तदहं त्वं च सर्वे वा विबुधादयः ॥ १० ॥
मुनिरुवाच ।
सर्व एव मिथः स्वप्नपुरुषाः सदसन्मयाः ।
एवमेतदिदं सर्वमन्योन्यं स्वप्नवत्स्थितम् ॥ ११ ॥
अन्योन्यमात्मनि तथा सदसच्चानुभूयते ।
दृश्यं येन यथा बुद्धं तथा तेनानुभूयते ॥ १२ ॥
नानैकं वस्त्वतोऽनेकं न सन्नासन्न मध्यगम् ।
जाग्रति स्वप्ननगरमिव वेदनमात्रकम् ॥ १३ ॥
अदृष्टपूर्वदूरस्थदृश्यमानपुरोपमम् ।
इति ते सर्वमाख्यातं बोधितोऽसि निरन्तरम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार कहनेपर विस्मय से व्याकुल हुई बुद्धि से इस दृश्यजगत का विचार कर मैं और
भी आश्चर्य को प्राप्त हुआ । इसके बाद रात्रि खुलनेपर प्रातःकाल के समय उन मुनि महाराज का मैंने
ऐसा आदर सत्कार किया कि जिससे वे मेरे घर पर ही रह गये । उसके बाद तो उस अरण्यस्थित घर में
और पूर्वजन्म के उस गाँव के घर में परस्पर प्रचुर प्रीतिवाले स्थिरवुद्धिसम्पन्न हम दोनों रहे । तदनन्तर
ऋतु, वर्ष आदि रूप काल के बीतने पर जैसे पर्वत वनाग्नि, वृष्टि आदि का ग्रहण और त्याग करता है,
वैसे ही मैं भी अनिष्ट, इष्ट और इष्टअनिष्टमिश्रित भावों का ग्रहण और त्याग करता हुआ स्थित हूँ। न
तो मैं मरण की इच्छा करता हूँ और न जीवन की अभिलाषा करता हूँ। जैसे स्थित हूँ वैसे ही बिना
सन्ताप के रहता हूँ। तदुपरान्त मैंने वहाँपर दृश्यमण्डल के विषय में विचार किया “यह क्या है, क्या
इसका कारण है ? और यह आत्मा इसको चित्त से क्या जानता है ?” एकमात्र चिदाकाशस्वरूपी
स्वप्नसदृश जगत् में यह पदार्थसंघात क्या है और क्या इसका निमित्त कारण है ? चिदेकघन स्वभाव में
स्थित चिन्मात्रआकाशरूप ही ये द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, विविध पर्वत, अनेक नदियाँ, दिशाएँ
सबके सब विकास को प्राप्त है