Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वयं प्राज्ञोऽसि जानासि यथेच्छसि तथा कुरु ।
एवं प्रबोधितस्यापि तव व्याध मते मतिः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्रूपी चन्द्रिका चारों ओर जिस अवभास (प्रकाश) का
विस्तार करती है वह यह जगत्रूप चित्र, जो कि स्थूल न होने के कारण प्रतिघात के योग्य स्वभाववाला
नहीं है, आकाश में भासित होता है