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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

क्षणं प्रबोधविश्रान्ता न विश्रान्ता परे पदे । नाभ्यासेन विना बोध एष याति मनोहृदि ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि पर्वत आदि स्थूल होने से प्रतिघात के योग्य हैं, वे अप्रतिघातस्वभाव कैसे होगे ? इसपर कहते हैं। न ये पर्वत हैं, न यह भूमि है, न यह आकाश है, न मैं ही हूँ यह सब केवल चिन्मात्रआकाश के स्फुरण का भान है