Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
परां परिणतिं प्राज्ञ दारुणीवाम्बुधारणे ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह चिन्मात्र-कचन (स्फुरण) ही है तो इस पदार्थराशि का कोई कारण नहीं है, क्योकि इसके
शरीर ग्रहण और उसके हेतु अप्रसिद्ध हैं, ऐसा कहते हैं।
इस पदार्थराशि का शरीर ग्रहण में क्या कारण हो सकता है ? कारण के बिना भला किसी वस्तु का
संभव हो सकता है ?