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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 154, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 25

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

कालतः आदि अन्त से शून्य, असीम, देशतः आदि-मध्यहीन वस्तुतः एक अद्वितीय अतएव कारणरहित, कार्यरहित ओर कार्यकारण के अधीन प्राणियों से रहित, स्वतःसत्ताप्रधान स्वसत्ता से ही भुवन आदि की सत्ता का निर्वाह करने के कारण नाना अनानारूप-सा वाणी ओर मन का अगोचर जो विभु चेतन है, वही सब कुछ है, उससे अतिरिक्त अणुमात्र भी नहीं हे