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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

अविद्यारूपमाभोगि किंप्रमाणमिदं जगत् । स्यादित्यात्मविकल्पेन तपस्त्वं कर्तुमुद्यतः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह बोध अभ्यास द्वारा अत्यन्त परिपक्व हुए बिना हृदय के अन्दर वैसे ही प्रविष्ट नहीं होता जैसे कि जलधारण कार्य के निमित्त छीलने-तराशने आदि से निर्मित कमण्डलु के आकार में परिणत हुए बिना काठ के अन्दर जल नहीं प्रविष्ट होता