Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
किमेतत्स्यादुतान्यत्स्यान्निर्वाणमिति संशयात् ।
नाध्यगच्छदसौ शान्तिं मूर्खो यौवनवानिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, विविध पर्वत, नदियाँ दिशाएँ आदि सकल भूत
सब जीवों के एकमात्र चित्स्वरूप सत् चिदाकाश ही हैं