Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 155, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अविद्याकृतमेवेदं दृश्यमित्येव चिन्तयन् ।
अविद्या जगदित्येषा नायाति निपुणं हृदि ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे व्याध, मैं शान्त हूँ, चारों ओर से
आनन्दसागर मेँ मग्न हूँ, दुःखसम्पर्कशून्य केवल आत्मसुख में स्थित हूँ, न मेरे लिए कोई विधि है ओर
न निषेध ही है। न मेरे लिए कुछ बाह्य है ओर न कुछ आन्तर है