Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 156, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 156, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 156 · श्लोक 56
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
तब तो पूर्वजन्म के दृढ़संकल्पजनित कर्मो के अनन्त होने से कदापि मोक्ष नहीं होगा ? इस आशंका
पर कहते हैं।
जो पुरुषश्रेष्ठ पूर्वकृत सुकृतों से आधुनिक शम, दम आदि साधनों को प्राप्त कर ब्रह्मज्ञान करानेवाले
श्रवण, मनन आदि उपायों द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्तकर ब्रह्मरूप से ही सो गये जगत्-दर्शन के लिए जागे
नहीं वे प्राक्तन सब कर्म ओर दुष्ट संकल्प आदि का, भले ही वे अत्यन्त दृढ़ क्यों न हो, उच्छेदकर
उत्कर्षं को प्राप्त होते हैं, लोगों के वन्दनीय होते हैं, अन्य नहीं