Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 157, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
अथ सिन्धुर्वदिष्यति ।
आर्यानार्यवपुः कोऽहमभवं विमतिः पुरा ।
यद्वशान्मे कुसंस्कारः प्राक्तनोऽस्ति भवप्रदः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
देह का त्यागकर प्राणयुक्त वायु से भी सूक्ष्म तुम्हारा जीव वायु की तरह उस महाकाश में रहेगा ऐसा
जो मुनि महाराज ने पूर्व सर्ग में कहा था, उसे चुनकर व्याध उसके बाद का अपना भविष्य पूछता है।
व्याध ने कहा : हे भगवन्, उसके बाद जब कि मेरा शरीर नीचे पृथिवीपर गिर जायेगा तब
विस्तीर्णं आकाश में बसनेवाले मेरा क्या हाल होगा ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पचपनवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छप्पनवाँ सर्ग वायु में स्थित व्याध का जीव राजा सिन्धु बनकर विदूरथ को मारकर अपने मन्त्री के मुँह से अपना तत्त्व सुनेगा, यह वर्णन ।