Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 157, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
ह्यस्तनी दुष्क्रियाभ्येति शोभां सत्क्रियया यथा ।
अद्यैव प्राक्तनीं तस्माद्यत्नात्सत्कार्यवान्भव ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
आपकी स्वेच्छानुसारिणी प्रवृत्ति के विषय में मेरे प्रति यह प्रश्न उचित नहीं है, ऐसी आशंका कर
उसका तात्पर्य प्रकाशित करते हैं।
हे मन्त्रिवर, मेरे चित्त में बैठी हुई यानी मेरी आत्मभूत भी सद्रूप यह भगवती सरस्वती मुझे मोक्ष की
इच्छारूप विज्ञप्ति देकर साधनसम्पत्ति द्वारा मेरे मोक्ष के लिए क्यों चेष्टा नहीं करती ?