Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 157, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 157, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 157 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
ना यथा यतते नित्यं यद्भावयति यन्मयः ।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति नान्यथा ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
देवता स्वतन्त्ररूप से अनुग्रह नहीं करते, किन्तु भक्त की चित्तवृत्ति के अनुसार ही अनुग्रह करते
हैं, इस विषय में “यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत् सनातनम्" श्रुति प्रमाणरूप से उद्धृत करते हैं।
जिसका चित्त जैसा होता है, वह जीव वैसा प्रलयपर्यन्त रहता है जो बात आबाल प्रसिद्ध है, उसे
कौन उलटा सकता है ?