Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 158, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
कालेन बहुनान्येन ततो युगशतात्मना ।
व्याधस्य कामनां दातुं पद्मजन्मा समाययौ ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह शरीर (उपाधि) कौन है जिसका त्याग न करता हुआ जीवात्मा को प्राप्त हुआ है ? इस पर उस
शरीर को ही कहते हैं।
आकाश के समान निर्मल चित्त को तो आप आतिवाहिक शरीर जानिये । (शंका - तव यह स्थूल
शरीर क्या है 2) समाधान - केवल चित्तरूप आतिवाहिक शरीर ही है उससे अतिरिक्त आधिभौतिक
आदि शरीर यहाँ नहीं हैं