Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 158, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
व्याधः स्ववासनावेशं निवारयितुमक्षमः ।
जानन्नपि वरं पूर्वं वर्णितं समयाचत ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह चित्त ही परलोक, इहलोक आदि तथा स्वप्न, जाग्रत, जीवन, मरण,
भोग, मोक्ष आदि संकल्पो से निराकार होकर भी साकार जगत् की तरह स्थित है