Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 8–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 158, verses 8–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 8-10
संस्कृत श्लोक
वर्धमानेन देहेन जगत्पारे महानभः ।
वेगादगणितं कालं पूरयामास शैलवत् ॥ ८ ॥
महागरुडवेगेन तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा ।
व्योम पूरयतस्तस्य कालो बहुतरो ययौ ॥ ९ ॥
अथ दीर्घेण कालेन यदा विद्याभ्रमस्य सः ।
अन्तं न समवाप्नोति तत्रोद्वेगमुपाययौ ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आकाश ओर शून्यता दोनों एक ही हैँ वैसे ही जगत् और
चित्त दोनों एक ही हैं (अभिन्न ही हैं) अप्रतिघरूप जगत् के आकार की कल्पना में निरंकुशसामर्थ्यवाले
चित्त में तनिक भी भिन्नता (द्वितीयता) नहीं हे । मिथ्या होने के कारण अकिंचिंत् हृदयस्थ वासनारूप
जगत्-जाल बाहर की तरह कुछ-सा स्थित है । जगत् को आप निराकार जानिये, क्योकि उसका
सर्जनहार चित्त ही वास्तविक नहीं हे । प्रथम सृष्टि के समय सात्विक देवताओं से रचितरूप होने
के कारण सत्त्वरूप हिरण्यगर्भ का समष्टिशरीर ब्रह्मपद से उदित हुआ । यह समष्टिरूप ही व्यष्टिभाव
में तामस विषयोंपर आसक्तिवश पहले उत्पत्तिप्रकरण में उक्त रीति के अनुसार राजस, सात्विक
आदि तेरह विभागों के क्रम से आज आपका तामस-तामस जीव हो गया है