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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 159, Verses 1–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 159, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 159 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

अग्निरुवाच । विपश्चिच्छ्रेष्ठ भो साधो त्वं गच्छाभिमतां दिशम् । स्थिरं भूमण्डलं भूयः प्रकृतव्यवहारवत् ॥ १ ॥ यज्ञं यष्टुं प्रजौघस्य शक्रः शततमं दिवि । तत्राहूतोऽस्मि मन्त्रेण गच्छामि गतिकोविद ॥ २ ॥ भास उवाच । इत्युक्त्वा भगवानग्निस्तत्रैवान्तरधीयत । गगने निर्मले याति अनलो वैद्युतो यथा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनिजी ने कहा : हे व्याध, यह सब भविष्य में होनेवाली घटनाका अतीत की तरह मैंने तुमसे वर्णन किया । इस समय जैसा तुम चाहते हो वैसा सोच समझकर भलीर्भोति करो | अग्नि ने कहा : हे विपश्चित्‌, मुनि के पूर्वोक्त वचन सुनकर मारे आश्चर्य के घबड़ाया हुआ व्याध एक क्षण सोचकर शीघ्र स्नान करने के लिए गया ओर मुनिजी भी स्नानार्थ गये बिना किसी कारण के आपस में मित्र बने हुए व्याध ओर महामुनि दोनों ने इस प्रकार शास्त्रचिन्तन करते हुए तपस्या की

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त एक यौ अद्जावनवाँ सर्ग मुनिजी का वचन सुनकर व्याध का तप करना, ब्रह्माजी के वरदान से आकाश में उड़ना तथा शव होकर भूमि पर गिरना आदि का वर्णन ।