Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 159, Verses 4–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 159, verses 4–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 159 · श्लोक 4-12
संस्कृत श्लोक
तथाहमपि चित्तेन प्राक्तनांश्च स्वयं वहन् ।
पुनः स्वकर्म निर्णेतुं भ्रमनव्योमनि संस्थितः ॥ ४ ॥
भूयोऽपि दृष्टवानस्मि जगन्त्यगणितानि खे ।
नानाचारविचाराणि नानासंस्थानवन्ति च ॥ ५ ॥
क्वचिच्छत्रमयाङ्गानि एकीभूतानि भूपते ।
भान्ति चेतन्ति चोपन्ति हृदयानि हरन्ति च ॥ ६ ॥
क्वचिन्मृन्मयदेहानि सर्वभूतानि राघव ।
भान्ति चेतन्ति चोपन्ति पर्वतप्रतिमानि च ॥ ७ ॥
क्वचिद्दारुमयाङ्गानि भान्ति भूतानि कुत्रचित् ।
क्वचित्पाषाणदेहानि सन्ति भूतानि भूरिशः ॥ ८ ॥
क्वचिदाजीवमेकत्र स्थितान्युपलदेहवत् ।
वांग्मात्रव्यवहाराणि भूतान्यालोकितानि खे ॥ ९ ॥
इत्यहं सुचिरं कालं पश्यन्नश्यन्मनस्तया ।
अविद्यान्तमपश्यंश्च तत्रोद्विग्नोऽभवं दृशाम् ॥ १० ॥
तपः कर्तुं समुद्युक्तः कस्मिंश्चिन्मोक्षसिद्धये ।
प्राहेन्द्रो मम चैवेदं मृगयोन्यन्तरं हि खे ॥ ११ ॥
प्रवृत्तः स्वर्गसंमोहे पूर्वाभ्यासवशीकृतः ।
मन्दारकानने तत्र भ्रमतो वै ममाम्बरे ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके
अनन्तर मुनिजी तो थोड़े ही समय में मुक्ति को प्राप्त हो गये। वे आयु के अवसान में अपनी पंचभोतिक
देह छोडकर परम पद में लीन हो गये । (70) तदुपरान्त सौ युगरुप चिरकाल में व्याध की मनोकामना
को पूर्ण करने के लिए भगवान् ब्रह्मा आये । बेचारा व्याध अपनी वासना का वेग रोक नहीं सका, अतएव
मुनिजी द्वारा पहले व्यर्थरूप से वर्णित वर को जानते हुए भी उसने वही वर ब्रह्माजी से माँगा ।
श्रीब्रह्माजी 'ऐसा ही हो" यों वांच्छित वर उसे देकर अपने लोक को सिधारे एवं व्याध अपनी तपस्या
का फल भोगने के लिए पक्षी की तरह आकाश में उड़ा | उसने पर्वत की तरह वर के अनुसार निरन्तर
बढ़ रहे शरीर से त्रैलोक्य से ऊपर अव्याकृत आकाश को बड़ वेग से अगणित समय में पूर्ण कर दिया ।
गरुड के से महावेग से तिरछे, ऊपर ओर नीचे आकाश को पूर्ण करने में उसका बहुत समय व्यतीत
हुआ | इसके अनन्तर जब चिरकाल में उसे अविद्यारूप भ्रमका अन्त प्राप्त नहीं हुआ तव तो उसका
अन्त देखने के विषय में उसने अपनी हार मान ली, उसे वैराग्य हो गया | तदनन्तर वैराग्य होने के
कारण प्राणवायु को शरीर से बाहर निकालनेवाली योगधारणा बोधकर उसने आकाश में प्राणों का
त्याग किया ओर नीचे भूमितल में शवभूत अपने शरीर का त्याग किया । उसका प्राणवायु से युक्त
चित्त उसी अव्यक्तआकाश में सम्पूर्णं पृथिवी का पालन करनेवाली तथा राजा विदूरथ की शत्रुभूत
पूर्वोक्त सिन्धुता को प्राप्त हुआ