Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 3–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 3–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
विपश्चिते दशरथो गृहदारधनादिकम् ।
राज्यानुरूपं विभवं प्रोत्तस्थौ कल्पयन्क्रमात् ॥ ३ ॥
राजरामवसिष्ठाद्या मिथः कृत्वा विसर्जनम् ।
यथाक्रमं पूजनं च प्रययुः स्वास्पदानि ते ॥ ४ ॥
स्नात्वा भुक्त्वा निशां नीत्वा प्रभाते पुनराययुः ।
तेनैव संनिवेशेन सा सभा संस्थिताऽभवत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
भासने
कहा : भगवान् अग्नि यह कहकर मूर्तिरूप से वहीं पर अन्तर्हित हो गये तथा अग्नि के रूप से विद्युत
(बिजली की) अग्नि की तरह निर्मल आकाश में गये । और मैं भी चित्त में अपने प्राक्तन अविद्या के
अन्त-दर्शनविषयक संस्कारों को स्वयं धारण करता हुआ फिर अपना दिगन्तगमनरूप कर्म करने के
लिए आकाश में घूमने लगा। फिर मैंने आकाश में असंख्य जगतो को देखा । उन सबके भिन्न-भिन्न
आचार-विचार थे ओर भिन्न-भिन्न रूपरेखाएँ थी