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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 38–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 38–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 38-40

संस्कृत श्लोक

यस्त्विदं कल्पितं च द्वे वस्तुनी अनुवर्तते । स्वर्गादिवदवाप्नोति प्राप्नोत्येवैकमेकधीः ॥ ३८ ॥ सिद्धाः सदा विभान्त्येवं यथान्तःकल्पनावशात् । नरकादीनि दुःखानि तथैवाभान्ति कल्पनात् ॥ ३९ ॥ यद्यत्संवेद्यते किंचित्तत्तथाप्यनुभूयते । सति वाऽसति देहेऽस्मिन्देह एव मनोमयः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वात्मा में संकल्प से उत्पन्न पदार्थ परस्पर मिलता है, यह बात मृगदर्शन आदि मे प्रत्यक्ष हे । इस विषय में यह उपपत्ति भी लोक में है जहाँपर छाया है वहींपर धूप भी है । यदि ऐसा न हो तो वह सर्वात्मा ही कैसे होगा ? इसलिए स्वस्वरूप ब्रह्म में संकल्पनगर परस्पर नहीं मिलता है यह सत्‌ है, संकल्पनगर परस्पर मिलता हे, यह भी सत्‌ हे । सर्वात्मा में सर्वत्र सब प्रकार से सर्वदा माया अघटितघटनापटीयसी होने से अति आश्चर्यमयी है, इसलिए भी सब कुछ घटना संभव हे