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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verses 65–66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verses 65–66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 65,66

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

वास्तव में तो आत्मा से अतिरिक्त कोर्ड द्रष्टा ही प्रसिद्ध नहीं है, इस आशय से कहते है । चूँकि वह शून्यरूप दुश्यशोभा आत्माकाश ही है, इसलिए अन्य से अदृष्ट चिद्रूपा हे जैसे स्वप्न का द्रष्टा आत्मा ही है वैसे ही इसका द्रष्टा भी आत्मा ही है, अन्य नहीं । यह केवल चिदाकाशस्वरूपा है इसीलिए परिज्ञात होते ही चिदाकाशाकार हो जाती है, ऐसा कहते हैं । यद्यपि यह परिज्ञान होकर अपने यथार्थ स्वरूप में स्थित होती है तथापि केवल प्रकाशमय निर्वाण स्वरूप होनेपर भी अज्ञानवश रात्रि खुलने के समय के अन्धकार की आकृति के तुल्य आकृतिवाली होकर दृश्यरूपा-सी भासती है