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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 160, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 160, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 160 · श्लोक 67

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि यथास्थित वस्तु अशेष विशेषो से शून्य होकर स्थित हो तो ज्ञान से बाधित होनेवाला जगत्‌ चाहे सत्‌ हो चाहे असत्‌ हो कोई भी हानि नहीं है, ऐसा कहते हैं। यथार्थ तत्त्व अशेष विशेषों से विहीन होकर स्थित हो तो जगत्समुदाय चाहे सत्‌ हो चाहे असत्‌ हो, ज्ञान से शान्त हो जाता है