Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 161, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
नास्त्येव विद्याऽविद्या वा चिदेवेयं कचत्यजा ।
ख एव खाकृतिः स्वप्न इव सर्गस्वदेहिनी ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष पूर्वसिद्ध ओर उपासना से कल्पित-दोनो प्रपंचो का
दृढ़ संकल्प से "यह अवश्य है” इस बुद्धि से अनुसरण करता है वह पुरुष जैसे यज्ञ आदि सत्कर्मकारी
स्वर्ग आदि अवश्य प्राप्त करता हे वैसे ही क्रमशः दोनों को ही प्राप्त करता हे । जो इनमें से एक ही सत्य
है एसी दृढ़ बुद्धिवाला है वह एक को ही प्राप्त करता है