Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 161, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः ।
तज्जाग्रत्स्वप्नदृश्यस्य रूपमित्येव निश्चयः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
सिद्धलोक में उक्त न्याय नरक आदि पाप-फलों की कल्पनाओं में भी तुल्य है, ऐसा कहते हैं।
जैसे अन्तःकरण की कल्पनावश सिद्धलोकों का सदा भान होता है वैसे ही कल्पनावश नरक आदि
दुःखप्रद लोकों का भी भान होता हे । दोनों में इतना अन्तर है कि उपासना का फल आस्तिकता ओर
अनुष्ठान के रहते अभ्यास के बिना सत्यरूप से दृढ़ होता है पाप का फल आस्तिकता ओर अभ्यास के
अभाव में भी केवल पापाचरणमात्र से “सत्य है" यों दृढ़कल्पनावाला हो जाता हे