Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 161, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 161, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 161 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
सबाह्याभ्यन्तरे दृश्ये शान्तनिद्रस्य यद्वपुः ।
एकस्य निशि तद्रूपं जाग्रत्स्वप्नदृशामिह ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्प की अनुसारिता सर्वत्र समान है, ऐसा कहते है ।
जिस किसी का जैसे संकल्प किया जाता है उसका, चाहे देह रहे या न रहे, वैसे ही अनुभव होता है
कारण कि शरीर तो सभी कल्पनामय ही हे