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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

निरस्तशब्दभेदार्थमनिरस्ताखिलार्थकम् । शाम्यामि परिनिर्वामि व्योमैवास्मीति बुद्ध्यताम् ॥ १६ ॥ त्यज्यतामात्मविश्रान्त्या शुद्धबोधैकरूपया । जीवेऽजवं जवीभावस्त्वसदुत्थित आत्मना ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

इससे ब्रह्म का अज्ञानी पुरुष के चित्तरूप उपाधि मे जगत्‌ के रूप में भान होता है अन्यत्र चिन्मात्ररूप से ही भान होता है, ऐसी व्यवस्था कहते है। जिस चित्‌धातु के आकाशभाग का यानी चिदाकाशांश का जहाँपर जैसे जैसे भान होता है वह वहाँपर वैसे वैसे मुक्ति पर्यन्त इस तरह बोध ओर अबोध स्वभाव से रहता है । यद्यपि यह दुश्यभ्रम आकाशमय (शून्य) है फिर भी जैसे जन्मतः तिमिर रोग से पीडित नेत्रवाले व्यक्ति का आकाश में एक चन्द्रमा के बदले दो चन्द्रमा दिखाई देना यह दोष शान्त नहीं होता वैसे ही अविचारवान्‌ (अज्ञानी) पुरुष का यह भ्रम शान्त नहीं होता