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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः । आत्मात्मना न चेत्त्रातस्तदुपायोऽस्ति नेतरः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मभावापन्न जगत्‌ का तो विनाश नहीं होता, ऐसा कहते है। जो यह कुछ दिखाई देता है वह निर्दोष, आदि अन्त विहीन चिदाकाश ही है तो उसका क्यों ओर कैसे नाश होगा ?