Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 19–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 19–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 19-25
संस्कृत श्लोक
तर तारुण्यमस्तीदं यावत्ते तावदम्बुधेः ।
ननु संसारनाम्नोऽस्माद्बुद्ध्या नावा विशुद्धया ॥ १९ ॥
अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो वृद्धः सन्किं करिष्यसि ।
स्वगात्राण्यपि भाराय भवन्ति हि विपर्यये ॥ २० ॥
शैशवं वार्धकं ज्ञेयं तिर्यक्त्वं मृतिरेव च ।
तारुण्यमेव जीवस्य जीवितं तद्विवेकि चेत् ॥ २१ ॥
संसारमिममासाद्य विद्युतसंपातचञ्चलम् ।
सच्छास्त्रसाधुसंपर्कैः कर्दमात्सारमुद्धरेत् ॥ २२ ॥
अहो बत नराः क्रूरा गतिः कैषां भविष्यति ।
कुर्वन्ति कर्दमोन्मग्ने नात्मन्यपि निजोदयम् ॥ २३ ॥
यथा मृन्मयवेतालसभा ग्राम्यस्य भङ्गदा ।
यथा भूतार्थविज्ञानान्मृन्मय्येव न भङ्गदा ॥ २४ ॥
तथा ब्रह्ममयी दृश्यलक्ष्मीरज्ञस्य भङ्गदा ।
यथा भूतार्थविज्ञाने ब्रह्मैवास्ते न भङ्गदा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानदशा में भी जगत् स्वप्नवत् चित् का विवर्तमात्र ही है, ऐसा कहते हैं।
अपने स्वच्छ संकल्पमय रूपका परित्याग न कर रहे अपना जो स्वप्न के तुल्य विकास है वही
यह जगत् है। वेदान्त आदि शास्त्रों के निर्णयों से, तीक्ष्ण बुद्धि से ओर परस्पर ऊहापोह से आत्मा
को सोया हुआ-सा बनाकर प्रबुद्ध पुरुष द्वारा जिसका ज्ञान होता है, वह आत्मा है । जो यह
व्यभिचरित न होनेवाली संवित् अविद्या नाम से आप लोगों में प्रसिद्ध है वह नदियों मे धूलिमय भूमि
की तरह हम लोगों की दृष्टि में है ही नहीं । जैसे स्वयं भलीर्भोति अनुभूत होनेपर भी स्वप्न में भूमि
का अस्तित्व है ही नहीं वैसे ही अपने द्वारा अनुभूत भी असत्मयी (मिथ्याभूत) यह दृश्यता नहीं हे ।
जैसे स्वप्न मेँ रूप आदि अर्थ की तरह और रूप को प्रकाशित करनेवाले तेज की तरह केवल
चिदाकाश ही भासता हे वैसे ही जाग्रत में जाग्रत् का साक्षी का स्वप्रकाश ही पदार्थाकार से दिखाई
देता है । सत्य वस्तु में (परमार्थ सत् वस्तु में) “यह स्वप्न है, यह जाग्रत् है” ऐसी जो भिन्नता भासती
है अनुभव से तुल्यस्वरूपवाले उनमें वह है ही नहीं । जैसे प्रबोध से (जागने से) स्वप्न की प्रतीति
“यह ऐसी नहीं हे यानी सत्य नहीं है” यों बाधित होती है वैसे ही परलोक में (अन्य शरीर में) प्रबुद्ध
हुए, गर्भ में स्थित तथा पूर्वं जन्म का स्मरण रखनेवाले पुरुष की जाग्रत में प्रसिद्ध प्रतीति भी "यह
ऐसी नहीं हे यानी सत्य नहीं है” यों बाधित होती ह