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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 28–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 28–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 28-32

संस्कृत श्लोक

तथानुभूयमानापि सर्गसंवेदनाम्बरे । चिन्मये तत्त्वविज्ञानाच्छून्यतैवावशिष्यते ॥ २८ ॥ जातिज्वरज्वलितजीवितजङ्गलेषु जीर्णानि वातहरिणाहरणक्रमेण । माद्यन्मनःपवनपातयुतान्यमूनि जित्वेन्द्रियाणि जयमेहि जहीहि जन्म ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ही जाग्रत्‌ है वही स्वप्न है ओर जो स्वप्न है वही जाग्रत है, क्यो कि दोनों में कालान्तर में “यह ऐसा नहीं है यानी सत्य नहीं है" यों बाधबुद्धि तुल्य हे । जैसे जीवनपर्यन्त सैकड़ों स्वप्न बिना किसी नियम के होते हैं वैसे ही निर्वाण प्राप्त न हुए जीव के महा अज्ञानरूपी स्वप्न में सैकड़ों जाग्रत्‌ भी होते हैँ । जैसे लोगों को उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले अनेक स्वप्नो का स्मरण होता हे वैसे ही पूर्वं जन्म की स्मृति करानेवाले यौगिक चमत्कार से सम्पन्न प्रबुद्धजनों को एक नहीं सैकड़ों जन्मों का स्मरण होता है । इस प्रकार स्वप्न ओर जाग्रत दोनों का पूर्णरूप से साम्य होने और दोनों के अनुभवरूप होनेपर यह सिद्ध हुआ कि स्वप्न के तुल्य ही जाग्रत्‌ का स्फुरण है ओर जाग्रत के तुल्य स्वप्नअनुभव का स्फुरण हे । जैसे दृश्य और जगत्‌-दोनों ही नित्य एकार्थ हैं उनके अर्थ में जरा भी भेद नहीं हे वैसे ही जाग्रत्‌ ओर स्वप्न-दोनों शब्द एकार्थवाले कहे गये हैं यानी दोनों के अर्थ में रत्ती भर भी भेद नहीं हे