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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 33–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 33–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 33,34

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जाग्रत्‌ में स्वप्न-समानता का प्रतिपादन करने का मतलब दिखलाते हैं। इस प्रकार जैसे विशालतम स्वप्ननगर चिन्मय आकाश ही हे वैसे ही यह जाग्रत्‌ जगत्‌ भी चिन्मयाकाश ही है, इसलिए अविद्या कहाँ है और उसका दर्शन ही कैसे हो सकता है ? यदि "स हि स्वप्नो भूत्वा" इत्यादि श्रुति जैसे स्वप्नशब्द से ब्रह्म ही कहा जाता है वैसे ही अविद्या शब्द से भी ब्रह्म ही कहा जाता है, तो शब्द में हमें विवाद नहीं है किन्तु सकल भ्रमो की शान्ति होनेपर जो ही है वही मैं हूँ। पहले स्वकल्पनारूप ही बन्धभ्रान्ति रही, यही हमारा अभिमत अर्थ है वह सिद्ध हो गया, यह भाव है