Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञाज्ञातो न मूर्खाणामज्ञाज्ञातो न तद्विदाम् ।
विद्यते सर्गशब्दार्थः सत्यासत्यमयात्मकः ॥ ५ ॥
तज्ज्ञाज्ञयोस्तयोरन्तःप्रतिपत्तौ तु यत्स्थितम् ।
न बोद्धुं न च वक्तुं ते जानीतस्तौ परस्परम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उन अनन्त पदाथाकार प्रतिभासो में अधिष्ठानभूत सन्मात्ररूप ब्रह्म शाखाप्रशाखाओं में वृक्ष की
तरह अनुगत रहता है, ऐसा कहते है ।
जैसे यहाँ एक ही अवयवी वृक्ष आदि नाना अवयवो में (शाखा-प्रशाखा आदि में) अनुगत रहता है
वैसे ही एक सच्चिदानन्द ब्रह्म प्रतिभात्मक जगदाकाश में अनुगत हे । जैसे देह की पिण्ड, हाथ, पैर
आदि अवस्थार्णे चिरकालतक रहने के कारण स्थायी हैं और निमेष, उन्मेष आदि अवस्थाएँ क्षणिक होने
के कारण अस्थिर हैं वैसे ही ब्रह्म की भूमि, अन्तरिक्ष, दिशा आदि कोई अवस्थाएँ चिरकाल स्थायी रहने
के कारण स्थिर हैं और कोई अन्य अवस्था प्रतिभात अर्थ के तुल्य क्षणिक होने से अस्थायी हैँ ।
स्वअवयवभूत उन सबमें ब्रह्म स्थित हे