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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 162, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

स्वबुद्धौ स्वर्गशब्दार्थो मिथोन्तस्तत्किलानयोः । स्थैर्यास्थैर्ये जाग्रतो द्वे अक्षीबक्षीवयोरिव ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

निज आत्मा में स्वप्ननगर के समान यह चितिचमत्कार केवल भान ही है उसमें सारभूत है या निस्सार है ऐसा आग्रह क्या ? अथवा सत्‌ है या असत्‌ है ऐसा भी आग्रह क्या ? ऐसा आग्रह मूढजन वृथा ही करते हैं, यह भाव है