Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 163, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नेषु मरणमनुभूतं न विद्यते ।
मरौ जलेच्छाऽविद्येयं विद्यमाना न विद्यते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह दृश्य ब्रह्म ही
है, यों यथार्थ विज्ञान होनेपर यह भय, क्लेश आदि नहीं देती |
यह दृश्य यथार्थज्ञान होने से पर कोई क्लेश आदि क्यो नहीं देता इस प्रश्न पर कहते है ।
यह दृश्य यथार्थ ज्ञान होने पर अशान्त होता हुआ ही शान्त हो जाता हे, स्थित होता ही हुआ
विलीन हो जाता है ओर दिखाई देता हुआ भी नहीं दिखाई देता