Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 12
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हिन्दी अर्थ
स्वधर्मविरुद्ध देहयात्रा हेतु अन्न आदि में इच्छा
का त्याग करता हुआ एवं शम और सन्तोष का उपार्जन करता हुआ जो स्थित रहता है वही
विजितेन्द्रिय है