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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 164, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 14

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

संवित्‌ का प्रयत्नपूर्वक ब्रह्म में आरोप करने से मन विषयों के पीछे दौड़ने के दुर्व्यसन का त्याग कर देता हे । वही मन की चंचलता है | मन चंचलता से छुटकारा पाकर विवेक की ओर अग्रसर होता है